पिथौरागढ़। उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में धार्मिक पर्यटन एक नया इतिहास रच रहा है। पिछले कुछ समय में इस सीमावर्ती क्षेत्र में देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं की तादाद में इस कदर उछाल आया है कि अब प्रशासन यहां सीधे हवाई सेवाएं शुरू करने की दिशा में गंभीरता से मंथन कर रहा है। इसके साथ ही, सैलानियों की इस भारी आमद को संभालने के लिए बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर), ठहरने के इंतजाम और खान-पान की सुविधाओं को भी बड़े पैमाने पर विकसित किया जा रहा है।

एक दौर था जब आदि कैलाश की कठिन और दुर्गम राहों को पार करना पर्यटकों के लिए एक बड़ी चुनौती माना जाता था। लेकिन अब वहां तक न सिर्फ बेहतरीन सड़क मार्ग तैयार किया जा रहा है, बल्कि आने वाले दिनों में यात्री सीधे विमान या हेलीकॉप्टर के जरिए भी पहुंच सकेंगे। दरअसल, इस पवित्र स्थल के प्रति लोगों की आस्था लगातार गहरी हो रही है और इसी वजह से अब यात्री यहां के लिए हवाई कनेक्टिविटी की मांग कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री के दौरे के बाद चमकी आदि कैलाश की किस्मत

पर्यटन विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो एक समय ऐसा भी था जब आदि कैलाश में पूरे सालभर में 300 पर्यटक भी नहीं पहुंच पाते थे। लेकिन 12 अक्टूबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिथौरागढ़ दौरे ने इस पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल दी। पीएम मोदी ने यहां पहुंचकर न केवल आदि कैलाश के दिव्य दर्शन किए, बल्कि पवित्र पार्वती कुंड और प्राचीन शिव मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना भी की थी। इस दौरे के वैश्विक स्तर पर प्रचारित होने के बाद से ही यहां आने वाले शिवभक्तों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है।

300 से शुरू हुआ सफर 50 हजार के पार

  • शुरुआती आंकड़े: साल 2015 से 2018 के बीच जब यहां के लिए कोई पक्की सड़क मौजूद नहीं थी, तब केवल बेहद साहसी और पैदल चलने वाले यात्री ही यहां पहुंचते थे, जिनकी संख्या बमुश्किल 300 के आसपास रहती थी। साल 2019 के सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, पूरे वर्ष में केवल 322 श्रद्धालु ही आदि कैलाश पहुंच सके थे।

  • अभूतपूर्व प्रगति: पिछले साल 2025 में यह आंकड़ा 6 साल के भीतर बढ़कर 36,000 तक पहुंच गया। वहीं, वर्तमान वर्ष 2026 में मई महीने से लेकर अब तक 52,000 से अधिक श्रद्धालु आदि कैलाश की यात्रा कर चुके हैं। हालांकि, मानसून और बरसात के चलते कुछ समय के लिए इसमें आंशिक गिरावट आ सकती है, लेकिन अधिकारियों को उम्मीद है कि इस साल के अंत तक यह आंकड़ा 1 से 1.5 लाख को पार कर जाएगा।

दुर्गम पहाड़ियों में इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती और होमस्टे का सहारा

पर्यटन सचिव धीराज गर्ब्याल के मुताबिक, पर्यटकों के इस भारी सैलाब के कारण सीमांत क्षेत्र में कुछ व्यावहारिक और नीतिगत चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। यह इलाका देश की सीमा से सटा और बेहद संवेदनशील होने के कारण यहां तत्काल आधारभूत ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। वर्तमान में इस दुर्गम क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर लोगों के ठहरने और भोजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इस समस्या को दूर करने के लिए अब युद्धस्तर पर नए लॉज और सुविधाओं का निर्माण किया जा रहा है।

इस पूरी मुहिम में सबसे सुखद पहलू यह है कि इसमें स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी बढ़-चढ़कर देखने को मिल रही है। पर्यटन के इस बूम से स्थानीय युवाओं और परिवारों के लिए स्वरोजगार के नए द्वार खुले हैं और लोग बड़े पैमाने पर 'होमस्टे' (Homestay) संस्कृति को अपना रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस धार्मिक क्रांति की वजह से उत्तराखंड के इस सीमांत क्षेत्र में 'रिवर्स पलायन' शुरू हो गया है; जो लोग कभी आजीविका की तलाश में मैदानों या बड़े शहरों की तरफ चले गए थे, वे अब अपने पैतृक गांवों में लौटकर पर्यटन व्यवसाय से जुड़ रहे हैं।

विमानन कंपनियां तैयार, ओम पर्वत जाने वालों को भी मिलेगा लाभ

उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (UCADA) के अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी (ACEO) संजय टोलिया ने बताया कि आदि कैलाश यात्रा को लेकर न केवल उत्तराखंड, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली से भी बेहद मजबूत डिमांड आ रही है। देश की कई प्रमुख कमर्शियल हवाई कंपनियां भी इस रूट पर अपनी सेवाएं देने के लिए उत्सुकता दिखा रही हैं। इसे देखते हुए बहुत जल्द आदि कैलाश के लिए हवाई गलियारा खोलने पर अंतिम मुहर लग सकती है।

प्रशासन का मानना है कि इस प्रस्तावित हवाई सेवा का लाभ केवल आदि कैलाश आने वाले श्रद्धालुओं तक ही सीमित नहीं रहेगा। भविष्य में इसका सीधा फायदा उन तीर्थयात्रियों को भी मिलेगा जो पवित्र 'ओम पर्वत' के दर्शन करना चाहते हैं, या फिर आवश्यक कूटनीतिक अनुमति मिलने के बाद सुदूर 'लिपू दर्रा' (Lipulekh Pass) की यात्रा पर जाना चाहते हैं।