बदरीनाथ धाम की अनसुनी परंपरा, हर चढ़ावे का हिसाब भगवान को सुनाने की प्रथा आखिर क्यों हुई बंद?
चमोली। बदरीनाथ धाम में भगवान बदरीविशाल को समर्पित एक बेहद अनूठी और पारदर्शी धार्मिक परंपरा वर्षों तक निभाई जाती थी। इस परंपरा के अनुसार, मंदिर के दान पात्रों में प्राप्त नकद धनराशि, स्वर्ण, रजत एवं अन्य बहुमूल्य भेंट की गणना के उपरांत इसका पूरा ब्योरा गर्भगृह की ओर मुख करके भगवान को सुनाया जाता था। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के मुख्य कार्याधिकारी शयन आरती के पश्चात मंदिर के मंडप में पहुंचते थे और पूरी श्रद्धा के साथ चढ़ावे का विवरण भगवान के सम्मुख प्रस्तुत करते थे।
परंपरा की शुरुआत और पारदर्शिता
वर्ष 2012 में बीकेटीसी के तत्कालीन मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह द्वारा इस व्यवस्था को प्रारंभ किया गया था। यह परंपरा मंदिर प्रशासन की पारदर्शिता और श्रद्धालुओं की अटूट धार्मिक आस्था का जीवंत प्रतीक बन गई थी। खजांची द्वारा गणना के बाद तैयार किया गया विवरण सीईओ को सौंपा जाता था, जिसे धर्माधिकारियों, वेदपाठियों और तीर्थयात्रियों की उपस्थिति में भगवान के चरणों में समर्पित किया जाता था। इस दौरान मुख्य कार्याधिकारी भगवान से यह प्रार्थना करते थे कि प्राप्त हुआ समस्त चढ़ावा प्रभु का है और इसका उपयोग मंदिर संचालन एवं उनके ही निमित्त किया जाएगा। कोरोना कालखंड में भी यह प्रक्रिया निरंतर जारी रही।
व्यवस्था का समापन और चर्चाएं
वर्ष 2021 में बीडी सिंह के सेवानिवृत्त होने के बाद यह अनूठी परंपरा अचानक बंद कर दी गई। हालांकि दान पात्रों की गणना का कार्य आज भी नियमित रूप से संचालित होता है, लेकिन भगवान को चढ़ावे का सार्वजनिक ब्योरा सुनाने की प्रथा अब समाप्त हो चुकी है। हाल के दिनों में इस परंपरा के बंद होने की चर्चाएं फिर से तेज हो गई हैं, जिससे भक्तजन और श्रद्धालु इसे पुनः शुरू करने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। इस पुरानी व्यवस्था की यादें आज भी मंदिर परिसर से जुड़े लोगों के मन में बसी हैं।
गणना प्रक्रिया के दौरान के अनुभव
पूर्व मुख्य कार्याधिकारी ने याद करते हुए बताया कि वर्ष 2012 के दौरान गणना कार्यों को अधिक निष्पक्ष बनाने के लिए कर्मचारियों को 'ढांगरी' यानी बिना जेब वाले विशेष वस्त्र पहनने का निर्देश दिया गया था, जिसका काफी विरोध भी हुआ था। उन्होंने बताया कि उस समय गणना प्रक्रिया में माणा, बामणी, पांडुकेश्वर गांव के निवासियों तथा पंडा पंचायत के प्रतिनिधियों को भी शामिल करने की एक व्यापक व्यवस्था बनाई गई थी। कालांतर में इन सुधारों और व्यवस्थाओं के साथ ही वह गौरवशाली परंपरा भी समय की धारा में खो गई, जो कभी मंदिर की कार्यप्रणाली को एक अलग पहचान प्रदान करती थी।
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