विकासनगर: मानव जीवन और प्रकृति का आपसी संबंध सदियों पुराना और अटूट रहा है। विशेष रूप से अर्ध-हिमालयी क्षेत्रों की गोद में कुदरत ने कई ऐसी अनमोल और औषधीय वनस्पतियां बिखेरी हैं, जो न केवल स्वाद में लाजवाब हैं बल्कि सेहत का खजाना भी हैं। इन्हीं में से एक बेहद खास और लोकप्रिय प्राकृतिक सौगात है पहाड़ों में गर्मियों और मानसूनी बरसात के मौसम में स्वतः उगने वाली हरी सब्जी 'लिंगुड़ा'।

वनस्पति विज्ञान की भाषा में इसे 'डिपलाजियम एस्कुलेंटम' (Diplazium esculentum) कहा जाता है। यह वास्तव में खाने योग्य जंगली फर्न (Fiddlehead Fern) की एक प्रजाति है, जो पहाड़ी इलाकों में नमी वाले गाड़-गदेरों (बरसाती पानी के प्राकृतिक नालों) और छांवदार नम स्थानों पर प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। अपनी घुमावदार और कोमल डंडियों वाली यह सब्जी आज उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण की एक नई और सुनहरी इबारत लिख रही है।

सेहत का बेजोड़ खजाना होने के साथ-साथ ग्रामीणों के लिए बना मौसमी रोजगार का मुख्य आधार

विकासनगर: लिंगुड़ा की सब्जी न केवल अपने बेहतरीन और अनूठे स्वाद के लिए पसंद की जाती है, बल्कि यह कई प्रकार के विटामिंस, खनिजों और पोषक तत्वों से भरपूर होती है। यही वजह है कि इन दिनों स्थानीय और बाहरी बाजारों में इसकी मांग आसमान छू रही है:

  • सीजनल आजीविका का जरिया: पहाड़ों में रहने वाले स्थानीय ग्रामीण सुबह-सुबह जंगलों और गदेरों की खाक छानकर इस कोमल सब्जी को चुनकर लाते हैं और बाजारों में बेचते हैं।

  • आर्थिक सुरक्षा की गारंटी: यह पारंपरिक जंगली सब्जी स्थानीय ग्रामीणों को साल में कम से कम दो से तीन महीने का सीजनल रोजगार प्रदान करती है, जिससे उनके परिवारों को एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच मिलता है।

जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह ने मौसमी सब्जी को बदला 'बारहमासी' कमाई के साधन में

विकासनगर: आमतौर पर केवल दो-तीन महीनों तक मिलने वाली इस मौसमी सब्जी को पूरे साल की आजीविका और मुनाफे का जरिया बनाने का अनूठा कारनामा कर दिखाया है उदपाल्टा क्षेत्र की कर्मठ महिलाओं ने:

  • संगठन से मिली शक्ति: क्षेत्र की 10 उत्साही और मेहनती महिलाओं ने एक साथ आकर 'जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह' की स्थापना की है।

  • चुनौती को अवसर में बदला: इस महिला समूह ने महसूस किया कि सीजन खत्म होने के बाद लिंगुड़ा बाजार से गायब हो जाता है। इस समस्या का हल निकालते हुए महिलाओं ने लिंगुड़ा का स्वादिष्ट और औषधीय गुणों से भरपूर अचार तैयार करने का निर्णय लिया, ताकि लोग सालभर इसके बेहतरीन स्वाद का लुत्फ उठा सकें। इसके अतिरिक्त यह समूह स्थानीय फलों और जड़ी-बूटियों से शुद्ध जूस तैयार करने का काम भी करता है।

दिल्ली और हरियाणा तक महका पहाड़ी अचार का स्वाद; ₹400 प्रति किलो की दर से हो रही बंपर बिक्री

विकासनगर: जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष निशा देवी ने अपने काम के अनुभवों और इस अनोखे सफर के बारे में बेहद उत्साहजनक जानकारियां साझा की हैं:

  • पिछले साल का शानदार मुनाफा: निशा देवी ने बताया कि पिछले वर्ष उनके समूह ने स्थानीय बाजार और प्रदर्शनियों के माध्यम से लगभग 50 हजार रुपये से अधिक मूल्य का लिंगुड़ा का अचार बेचकर बेहतरीन मुनाफा कमाया था।

  • इस वर्ष बड़ा लक्ष्य: पिछले साल मिली इस बड़ी सफलता से उत्साहित होकर इस साल महिलाओं ने उत्पादन का दायरा काफी बढ़ा दिया है। इस अचार की सबसे ज्यादा मांग दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा जैसे मैदानी राज्यों में देखी जा रही है। वर्तमान में इस उच्च गुणवत्ता वाले शुद्ध पहाड़ी अचार की कीमत 400 रुपये प्रति किलोग्राम तय की गई है।

स्थानीय ग्रामीणों से ₹80 किलो की दर पर लिंगुड़ा की खरीद; मेहनत और पारंपरिक मसालों का बेजोड़ मेल

विकासनगर: लाखामंडल क्षेत्र के जाने-माने समाजसेवी बच्चना शर्मा ने महिला समूह की इस आत्मनिर्भर पहल की सराहना करते हुए इसकी पूरी मेकिंग प्रोसेस और आर्थिक गणित को विस्तार से साझा किया है:

  • ग्रामीणों को मिल रहा उचित मूल्य: बच्चना शर्मा के अनुसार, जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह की सदस्य महिलाएं अचार बनाने के लिए खुद भी जंगलों से लिंगुड़ा बीनकर लाती हैं। इसके अलावा, वे गांव के अन्य जरूरतमंद ग्रामीणों और बच्चों से भी 70 से 80 रुपये प्रति किलो की दर से ताजा लिंगुड़ा खरीदती हैं, जिससे गांव के अन्य लोगों को भी घर बैठे कमाई हो रही है।

  • बनाने की पारंपरिक विधि: अचार तैयार करने के लिए सबसे पहले लिंगुड़ा को बेहद सावधानी से साफ किया जाता है। इसके बाद इसकी निश्चित आकार में कटिंग कर इसे उबाला जाता है। फिर धूप में अच्छी तरह सुखाने के बाद इसमें शुद्ध सरसों के तेल और स्थानीय स्तर पर तैयार पारंपरिक पहाड़ी मसालों का मिश्रण मिलाकर इसे स्वादिष्ट अचार का रूप दिया जाता है।

  • तीन क्विंटल अचार की तैयारी: उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष के ₹50,000 के कारोबार के मुकाबले इस साल महिलाएं लगभग तीन क्विंटल (300 किलो) लिंगुड़ा का अचार तैयार करने के बड़े लक्ष्य पर काम कर रही हैं।

सरकारी योजनाओं का मिल रहा सीधा संबल; अन्य महिलाओं को भी प्रेरित करने का लिया संकल्प

विकासनगर: इस ग्रामीण उद्यम को सरकारी नीतियों से भी काफी संबल मिल रहा है, जिससे महिलाओं का हौसला और अधिक बुलंद हुआ है:

  • सरकारी मदद से बढ़ी ताकत: समाजसेवी बच्चना शर्मा ने बताया कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं और सब्सिडी प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं, जिसका सीधा लाभ इस समूह को भी मिल रहा है।

  • स्वरोजगार की अलख जगाने का संकल्प: उन्होंने कहा कि वे अपने क्षेत्र की अन्य ग्रामीण महिलाओं को भी इस दिशा में प्रेरित करेंगी ताकि वे संगठित होकर स्वयं सहायता समूहों का गठन कर सकें और पहाड़ों के इस अनमोल कुदरती खजाने (लिंगुड़ा) का सही उपयोग कर अचार निर्माण के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत और आत्मनिर्भर बना सकें।