नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) ने प्रदेश के भीतर स्वास्थ्य विभाग द्वारा हाल ही में किए गए विशेषज्ञ डॉक्टरों और चिकित्साधिकारियों के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण (तबादलों) पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस थोक तबादला नीति के कारण राज्य की बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पूरी तरह से चरमराने और प्रभावित होने के मामले में दायर एक बेहद महत्वपूर्ण याचिका पर गंभीर सुनवाई की। मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को कड़े लहजे में स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं कि इन तबादलों के बाद अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी को कैसे पूरा किया जाएगा। कोर्ट ने मामले की विस्तृत और अगली सुनवाई के लिए 3 जुलाई (आज) की तिथि नियत की है।

यह महत्वपूर्ण सुनवाई वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी एवं न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ के समक्ष संपन्न हुई, जहां राज्य की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सरकार को कड़े सवालों का सामना करना पड़ा।

जनहित याचिका में खुला स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का राज

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी कार्रवाई को विस्तार से समझें तो यह पूरा मुद्दा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) की ओर से दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा हुआ है:

  • बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर PIL: राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने नैनीताल जिला सहित पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी बदहाली, आधुनिक उपकरणों की कमी और डॉक्टरों के खाली पड़े पदों को लेकर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। यह संवेदनशील मामला पहले से ही अदालत में विचाराधीन है।

  • अदालत में हस्तक्षेप प्रार्थना पत्र: हाल ही में स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए गए डॉक्टरों के बंपर तबादलों के बाद, विधिक सेवा प्राधिकरण ने हाईकोर्ट में एक नया 'हस्तक्षेप प्रार्थना पत्र' (Intervention Application) दाखिल किया। प्राधिकरण के वकीलों ने खंडपीठ को अवगत कराया कि बिना किसी ठोस वैकल्पिक व्यवस्था के किए गए इन ताबड़तोड़ स्थानांतरणों से प्रदेश के बड़े सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं।

बीडी पांडे अस्पताल और हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज की डरावनी तस्वीर

अदालत के समक्ष हस्तक्षेप प्रार्थना पत्र के माध्यम से प्रदेश के दो बड़े चिकित्सा केंद्रों की जो वास्तविक और डरावनी स्थिति पेश की गई, उसने सबको चौंका दिया:

  • नैनीताल बीडी पांडे जिला अस्पताल: पर्यटन नगरी नैनीताल के इस प्रमुख जिला चिकित्सालय से स्वास्थ्य विभाग ने एक झटके में 6 विशेषज्ञ डॉक्टरों का स्थानांतरण कर दिया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि इन अनुभवी विशेषज्ञों के बदले अस्पताल में केवल 5 सामान्य डॉक्टर (MBBS) और महज 1 विशेषज्ञ डॉक्टर को भेजा गया। इससे अस्पताल में गंभीर बीमारियों के इलाज और ऑपरेशनों पर पूरी तरह रोक लगने की नौबत आ गई है।

  • हल्द्वानी राजकीय मेडिकल कॉलेज: कुमाऊं क्षेत्र के इस सबसे बड़े लाइफलाइन मेडिकल कॉलेज से 16 विशेषज्ञ डॉक्टरों का एक साथ तबादला कर दिया गया। इस अव्यवहारिक फैसले का सबसे बुरा असर कॉलेज के प्रसूति रोग विभाग (गायनेकोलॉजी डिपार्टमेंट) पर पड़ा है, जहां अब केवल 2 विशेषज्ञ डॉक्टर ही ड्यूटी पर बचे हैं।

  • मानकों की सरेआम धज्जियां: याचिका में कोर्ट को बताया गया कि 'मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया' (MCI) के स्थापित और अनिवार्य मानकों के अनुसार, हल्द्वानी जैसे बड़े मेडिकल कॉलेज के प्रसूति विभाग में कम से कम 15 विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती होनी चाहिए, लेकिन यहाँ केवल 2 डॉक्टर पूरे संभाग का बोझ उठा रहे हैं। इसके अलावा, वर्तमान में हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में फैकल्टी (प्रोफेसर व डॉक्टर) के 112 पद लंबे समय से खाली पड़े हैं।

बिना विकल्प के डॉक्टरों को भेजा, मरीज राम भरोसे

प्राधिकरण ने अदालत को यह भी बताया कि केवल नैनीताल या हल्द्वानी ही नहीं, बल्कि प्रदेश के अन्य सुदूर पर्वतीय जिलों के सरकारी अस्पतालों से भी विशेषज्ञ डॉक्टरों का स्थानांतरण तो कर दिया गया, लेकिन उनके स्थान पर किसी भी 'प्रतिस्थानी' (रिप्लेसमेंट या नए डॉक्टर) को ड्यूटी पर भेजा ही नहीं गया। और जहां कहीं भी नए डॉक्टरों को भेजा गया है, वहां विशेषज्ञों की जगह सामान्य डॉक्टरों को नियुक्त कर दिया गया है। इससे गंभीर रूप से बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को इलाज के लिए निजी अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं या वे दम तोड़ने को मजबूर हैं। हाईकोर्ट ने सरकार को इन सभी बिंदुओं पर 3 जुलाई तक अपना विस्तृत और बिंदुवार जवाब दाखिल करने का अंतिम आदेश दिया है।